Obsession and toxic marriage
वो शादी, जो उसकी दुनिया बननी थी... पर उसकी तबाही बन गई। कृष मालवीय और मनस्वी बजाज। नामों का बंधन तो मंत्रों में बंध चुका था, लेकिन दिलों के बीच खाई एक महासागर जितनी चौड़ी थी। कृष के लिए, ये शादी एक अनचाहा बोझ था, एक ऐसी ग़लती जिसे वो रोज़ अपनी सांसों में महसूस करता था। और मनस्वी के लिए, ये शादी उसके सपनों का महल था। वो दिन, जब उसने लाल जोड़ा पहना था, वो उसकी ज़िंदगी का सबसे खूबसूरत पल था। लेकिन सपने, हकीकत से टकराते ही चकनाचूर हो गए। सुहागरात की वो लंबी, सूनी रात...महल जैसे कमरे में अकेली बैठी मनस्वी, हर कदम की आहट पर उम्मीद से उठती नज़रें... और फिर वो सच, जिसने उसके सारे अरमानों को तार-तार कर दिया। उसका पति, उसकी अपनी ही बहन से प्यार करता था। वही बहन जिसे उसने अपनी सहेली, अपना हमदर्द समझा था। मनस्वी का दर्द इतना गहरा कि सांस लेने में भी तकलीफ होने लगी। दिल टूटा तो ऐसे, जैसे कांच के हज़ार टुकड़े हो गए हों। अब सवाल ये नहीं था कि वो ये शादी कैसे निभेगी या नहीं। सवाल ये था कि वो कैसे जिएगी? कैसे रोज़ अपनी आंखों के सामने, अपने ही घर में, अपने पति को किसी और के साथ प्यार में डूबा देखेगी? और वो भी अपनी ही बहन को? क्या वो चुपचाप सब सहती रहेगी, अपने दिल की आवाज़ को दबाकर? या फिर कोई ऐसा रास्ता चुनेगी जहां वो अपना प्यार खो देगी ? क्या प्रेम की इस जंग में, स्वाभिमान की कीमत पर हार मान लेना ही उसकी नियति है?




