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क्योंकि इसे तुमने छुआ है।"

धानी ने ये कह तो दिया था, लेकिन अब उसके चेहरे पर खुद ही परेशानी के भाव आ गए थे। उसका दिल एकदम धंस-सा गया था। कृष की बात सुनकर उसे लगा शायद शादी के बाद कृष बदल जाएगा, लेकिन कृष में जरा भी फर्क नहीं पड़ा। अब उसे एहसास हो रहा है कि इस शादी को निभाना सिर्फ और सिर्फ मनस्वी के लिए एक बहुत बड़ा चैलेंज है। लेकिन उसे मनस्वी पर भरोसा था। उसे कहीं ना कहीं मनस्वी के अंदर अपनी छवि नजर आ रही थी।

वहीं दूसरी तरफ कमरे में मनस्वी आईने के सामने खड़ी थी। कृष के जाने के बाद उसने सबसे पहले तो अपने कपड़े बदले। उसने भारी-भरकम लहंगे से खुद को आजाद किया और एक सिंपल-सी लेकिन खूबसूरत-सी साड़ी पहन ली, जैसी कि एक नई नवेली दुल्हन को पहननी चाहिए। उसने सारे गहने उतार दिए, लेकिन अभी भी उसके चेहरे पर दुल्हन वाला मेकअप लगा हुआ था। मांग में सिंदूर भरा हुआ था, गले में मंगलसूत्र था और हाथों की मेहंदी अभी भी सुर्ख लाल थी। उसने सिर्फ कपड़े बदले थे और गहने उतारे थे, बाकी उसका चेहरा अभी भी दुल्हन के रूप से निकला हुआ था।

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