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हम अपनी इस दुश्मनी को रिश्तेदारी में बदल देते हैं

बीकानेर रॉयल पैलेस...

एक बहुत बड़े हीरे के व्यापारी ने रॉयल पैलेस में बहुत ही शानदार पार्टी का आयोजन किया था क्योंकि आज उनकी कंपनी को 50 साल पूरे हो गए थे... और इस पार्टी में राजस्थान से लेकर देश-विदेश के कई नामीगिरामी और बड़े-बड़े लोग शरीक हुए थे क्योंकि उनका हीरों का व्यापार बहुत बड़ा था और कई बार राजा-महाराजाओं से लेकर विदेशी मंत्री तक उनके हीरे से बने आभूषण पहनने के शौकीन रखते थे...

मिस्टर कुलभूषण ज़रीवाला हीरा व्यापारी का नाम ही बहुत बड़ा था। उनका कोई दुश्मन नहीं था और कोई भी उनकी पार्टी में आने से इनकार नहीं कर सकता था और उनका आदर-सम्मान भी उतना ही था क्योंकि उनकी उम्र 80 साल के ऊपर की थी और सब उन्हें बहुत रिस्पेक्ट दिया करते थे...

पार्टी हॉल में जोरों-शोरों से पार्टी शुरू हो चुकी थी। सारे बड़े-बड़े लोग आपस में मिल रहे थे और एक दूसरे के साथ मिल-जुल बैठ रहे थे। कुछ लोग व्यापार के सिलसिले में भी एक दूसरे के साथ बातें कर रहे थे तो कुछ लोग नॉर्मली ही बातें कर रहे थे। इसी पार्टी में एक और शाही परिवार शामिल था और वो थे सूर्यनगर के राजा साहब और उनकी धर्मपत्नी यानी कि रुद्रांश और रागिनी...

ये उनके इतने खास मेहमान थे कि पार्टी के होस्ट खुद कुलभूषण ज़रीवाला इन्हें अटेंड करने आए थे। रागिनी ने आकर उनके पैर छुए और आशीर्वाद लिया और रुद्र ने भी उनके पैर छुए क्योंकि वो उम्र में काफी बड़े थे और रुद्र के खानदान में कई सालों से उनके ही बनाए हुए गहने पहने जा रहे हैं, यहां तक कि उनका शाही खानदानी हार भी इन्हीं के हाथों से बना हुआ है...

मिस्टर कुलभूषण व्हीलचेयर पर बैठे हुए थे क्योंकि उम्र के साथ अब उनके चलने-फिरने की शक्ति कम हो गई थी...

उन्होंने रुद्र को देखते हुए कहा, "राजा साहब, आप हमारे बुलाने पर यहां आए, हमें बहुत खुशी हुई। उम्मीद करते हैं कि आपको हमारी छोटी सी मेहमाननवाजी पसंद आ रही होगी। फिर भी अगर कोई कमी रह जाए तो बता दीजिएगा, हम पूरी कोशिश करेंगे उसे पूरा करने की।"

रुद्र हंसते हुए कहता है, "कैसी बातें कर रहे हैं आप काका साहब? अपने इतने बड़े दिन पर हमें बुलाया यही बहुत बड़ी बात है और किसी भी चीज़ की कोई कमी नहीं है। उल्टा अगर किसी चीज़ की कमी आपको नज़र आती है तो आप अपना बेटा समझ कर मुझे कह सकते हैं..."

कुलभूषण जी और रुद्र बात कर रहे थे और रागिनी उन्हीं के पास खड़ी थी... कुलभूषण जी ने रुद्र से बच्चों के बारे में पूछा तो रुद्र ने बताया कि उनकी बेटी मेडिकल की पढ़ाई के लिए जयपुर में है और उनका बेटा भी अपने एग्ज़ाम की तैयारी के लिए महल में ही रुका हुआ है...

कुलभूषण जी सोचते हुए कहते हैं, "वक्त कितनी जल्दी गुज़र जाता है ना राजा साहब? अभी ऐसा लगता है कल की ही बात है जब आपके होने की मिठाई हमारे घर पर आई थी... और अब देखो आपके बच्चे भी इतने बड़े हो गए हैं... वैसे आपकी बड़ी बेटी तो अब शादी की उम्र की होगी। तो क्या कहते हैं, कोई लड़का देखा है उसके लिए?"

पर तभी रागिनी ने मुस्कुराते हुए कहा, "जी, अभी तक तो कोई नहीं देखा है, लेकिन बहुत जल्द ढूंढना शुरू करेंगे। आपकी नज़र में कोई अच्छा रिश्ता हो तो हमें ज़रूर बताइएगा... हमारी बेटी का साफ़ कहना है, शादी करेगी तो हमारी पसंद से ही।"

ये सुनकर कुलभूषण जी हंसते हुए कहते हैं, "अरे, ये क्या बात हुई? आजकल के बच्चे हैं, अपनी पसंद से ही कोई ना कोई जीवनसाथी ढूंढ लेते हैं, और यहां आपकी बेटी कह रही है कि वो आपकी पसंद से शादी करेगी? अगर वो ऐसा कह रही है तो इसका मतलब उसके अंदर अच्छे संस्कार हैं... वरना आजकल के बच्चों का भरोसा नहीं है। दरवाज़े पर खड़े हो जाते हैं और कहते हैं, 'हमें आपका आशीर्वाद चाहिए'..."

उनकी बात सुनकर रुद्र और रागिनी दोनों हंस रहे थे। तभी पीछे से एक औरत की आवाज़ आती है जो उनसे कह रही थी, "सही कहा आपने कुलभूषण जी, आजकल के बच्चों को मां-बाप की पसंद की परवाह ही कहां है? वो हमारा ज़माना और था जब मां-बाप के एक इशारे पर बच्चे अपनी जान दे दिया करते थे, आजकल तो सबको अपनी मन की ही करनी है..."

रुद्र, कुलभूषण जी और रागिनी तीनों एक साथ पलटकर उस तरफ़ देखते हैं जहां पर इस समय सुलोचना राठी खड़ी थी... उन्होंने क्रीम कलर की रॉयल बॉर्डर बनारसी साड़ी पहन रखी थी और गले में कुलभूषण जी की कंपनी का बनाया हुआ हीरों का डायमंड नेकलेस था।

रागिनी उन्हें नहीं जानती थी इसीलिए वो उन्हें हैरान नज़रों से देख रही थी, लेकिन रुद्रांश को तो पता था ना ये कौन है। सुलोचना राठी उनके पास आती है और मुस्कुराते हुए रुद्र को देखकर कहती है, "कैसे हैं राजा साहब? काफ़ी समय बाद मुलाक़ात हुई है आपसे..."

अब रुद्र इस सवाल का क्या जवाब दे? वो सुलोचना राठी को अच्छी तरह से जानता था। सालों पुरानी दुश्मनी चलती आ रही थी...

रुद्र को बहुत अजीब लग रहा था। रागिनी तो उन्हें पहचानती ही नहीं थी इसलिए वो नॉर्मल ही खड़ी थी और उधर के कुछ कहने का इंतज़ार कर रही थी। रुद्र ने नाटकीय ढंग से ज़बरदस्ती हंसते हुए कहा, "जी, मैं ठीक हूं, मैडम राठी। शुक्रिया पूछने के लिए..."

उसके बाद रुद्र जल्दी से रागिनी की तरफ़ देखते हुए कहता है, "चलो, चलकर डिनर कर लेते हैं, फिर हमें घर के लिए भी निकलना है, व्योम घर में अकेला है..."

रागिनी ने भी हां में सिर हिलाया। वो लोग वहां से जाने ही वाले थे कि सुलोचना राठी ने एक बार फिर से उन्हें रोकते हुए कहा, "क्या बात है राजा साहब, मुझसे भाग रहे हैं? क्या बात नहीं करना चाहेंगे? अरे, इतनी पुरानी जान-पहचान है हमारी। कम से कम ठीक से खड़े होकर 2 मिनट बात तो कर लीजिए..."

उनकी बात सुन रुद्र रुक जाता है और हैरानी से सुलोचना जी को देखने लगता है। आख़िर उन्हें रुद्र से क्या बात करनी है? वैसे भी उनके खानदान के बीच की दुश्मनी सालों पहले से चली आ रही है। हां, ये अलग बात है कि अंबर राठी के बाद से उन दोनों के बीच कोई ऐसी दुश्मनी का सिलसिला नहीं चला है, लेकिन दुश्मनी ख़त्म भी तो नहीं हुई है...

रुद्र थोड़ा कंफ्यूज़ लग रहा था। पर सुलोचना राठी हंसते हुए कहती है, "अरे राजा साहब, आप इतने घबराए हुए क्यों हैं?... किस बात से डर रहे हैं आप?"

रुद्र ने हल्की सी मुस्कान के साथ—जो कि बहुत मतलबी मुस्कान थी— कहा, "नहीं, मैं डर नहीं रहा हूं, बस सोच रहा हूं कि आपसे बात करूं भी तो क्या करूं? हमारे बीच ऐसी कोई बात है ही नहीं जो की जा सके..."

सुलोचना ने भी ये सुन हंसते हुए कहा, "बिल्कुल सही कहा आपने। बातें तो दोस्तों में होती है, दुश्मनों में थोड़ी ना? वैसे भी हम दोनों की दुश्मनी तो सालों पुरानी रही है। ऐसे में बात करने का क्या ही मतलब है..."

रागिनी अब और हैरान होकर रुद्र को देखने लगती है। क्योंकि उसे समझ ही नहीं आया ये औरत हमारी दुश्मन है? लेकिन क्यों? और ये कौन सी दुश्मनी है? उसे नहीं पता था, पर वो फिर भी उनके बीच खड़ी थी और चुपचाप उनकी बातें सुन रही थी।

वहीं सुलोचना ने हंसते हुए कहा, "राजा साहब, अगर आप ये सोचकर मुझसे कतरा रहे हैं कि मैं बरसों पुरानी चली आ रही उस दुश्मनी के बदले आपको कुछ सुनाऊंगी तो आप गलत सोच रहे हैं। अरे, मैं तो उस बात को कब की भूल गई हूं... पर मुझे लगा नहीं था कि आप अभी भी उसी में पड़े हुए बैठे रहेंगे। इतने साल हो गए हैं, अब आप भी भूल जाइए ये सब..."

ये सुन रुद्र हैरान हो गया। उसने कहा, "नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है... पर मुझे लगा नहीं था कि आप इतनी बड़ी बात भूल जाएंगी। मतलब आपका बेटा..."

पर तभी सुलोचना राठी ने अपना हाथ दिखाते हुए कहा, "राजा साहब, उस हादसे को गुज़रे कई साल हो चुके हैं... इसलिए मैंने वो हादसा भुला दिया... क्योंकि उस दिन मुझे समझ में आया कि उस दुश्मनी का कोई मतलब नहीं था, उसे भूल जाना ही बेहतर था। अगर वो दुश्मनी सालों पहले ख़त्म हो जाती तो शायद आज मेरा बेटा मेरे साथ होता। पर शायद उसका अंत ऐसे ही होना लिखा था। इसीलिए तो इतने सालों तक ना तो मैंने आपसे इस बारे में कोई सवाल किया और ना ही इसके ऊपर कोई एक्शन लिया, क्योंकि मैं इस दुश्मनी को सालों पहले भूल चुकी हूं। मुझे लगा था आप भी भूल चुके हैं।"

कुलभूषण जी रुद्र से कहते हैं, "राजा साहब, अगर मैडम राठी ने इस दुश्मनी को भुला दिया है तो आप क्यों अपने साथ इसे लेकर घूम रहे हैं?" रुद्र ने तुरंत उनसे कहा, "नहीं काका साहब, मैं उस दुश्मनी को अपने साथ लेकर नहीं घूम रहा हूं, बल्कि मैं भी उसे सालों पहले ही ख़त्म कर देना चाहता था... और मैं तो किसी की जान भी नहीं लेना चाहता था। वो तो मिस्टर राठी की जान जाना एक हादसा था, मैं उसे मारना नहीं चाहता था, बस वो गलती से शिकार हो गया। और अगर मैडम राठी दुश्मनी को भूल चुकी हैं तो ठीक है, मैं भी दुश्मनी को भूल जाता हूं।"

सुलोचना ने हंसते हुए कहा, "चलो, ये तो अच्छी बात है। अगर आपने भी दुश्मनी भुला दी है तो फिर तो टेंशन ही ख़त्म... अब हम नॉर्मली दोस्तों की तरह ही एक दूसरे के साथ मिला करेंगे। वैसे भी पास के दिन ही कितने बचे हैं? सोच रही हूं जो थोड़े बहुत दिन हैं, सुकून से जी लूं... पोते को तो मिला लिया है, अब पोते के बच्चे को मिला लूंगी तो बस समझ लूंगी कि जीवन सफल हो गया है मेरा..."

उसके बाद सुलोचना ने कुलभूषण जी को देखते हुए कहा, "अरे हां, यहां पर मैं आपसे यही कहने आई थी... दरअसल मेरा पोता संग्राम वो शादी की उम्र का हो गया है, तो मैं आपसे यह कहने आई थी कि अगर उसके लिए कोई अच्छी लड़की हो जो आपकी नज़र में हो तो मुझे ज़रूर बताना..."

और फिर सुलोचना जी ने रुद्र को देखते हुए भी कहा, "और राजा साहब, आप भी अगर आपकी नज़र में कोई अच्छी लड़की हो तो मुझे ज़रूर बताना। मुझे मेरे पोते के लिए एक अच्छी संस्कारी और सुशील दुल्हन की तलाश है..."

रुद्र ने हल्की सी मुस्कान के साथ सिर हिलाया। लेकिन कुलभूषण जी तुरंत कहते हैं, "हां, तो समझ लीजिए आपकी तलाश पूरी हो गई। अभी-अभी राजा साहब ने भी तो मुझे यही कहा था कि उन्हें अपनी बेटी के लिए एक अच्छे लड़के की तलाश है और आपको भी आपके पोते के लिए एक लड़की की तलाश है। मैं तो कहता हूं कि आप दोनों अपने बच्चों के रिश्ते के बारे में बात कीजिए!"

सुलोचना जी की आंखों में चमक और चेहरे पर शैतानी मुस्कान थी। वो इसी इरादे से तो यहां पर आई थी। लेकिन रुद्र और रागिनी एक दूसरे को हैरानी से देखते हैं। रागिनी ने तुरंत कहा, "नहीं-नहीं, ये नहीं हो सकता है!"

सुलोचना ने रागिनी को देखने लगी और कुलभूषण जी भी हैरानी से देखते हैं तो रुद्र ने तुरंत बोल दिया, "मेरी वाइफ़ का कहने का मतलब ये है कि हम अभी इतने सीरियस नहीं हैं। हमारी बेटी अभी पढ़ाई कर रही है, तो हमें उसकी शादी की इतनी जल्दी नहीं है। वो तो हमने बस यूं ही बातों-बातों में कुछ कह दिया था... बाकी हमने अभी ऐसा कुछ सोचा नहीं है।"

सुलोचना ने जल्दी से उस बात को अपने हाथ में लेते हुए कहा, "राजा साहब, सोचा नहीं है तो सोच लीजिए ना! वैसे भी कुलभूषण जी ने काफ़ी अच्छा विचार बताया है। हमारी पुरानी दुश्मनी ख़त्म हो चुकी है, इस बात का सबसे बड़ा सबूत यही हो सकता है कि हम अपने बच्चों की शादी करवा दें। और आपकी बेटी पढ़ाई कर रही है तो हम कौन सा शादी के बाद उसकी किताबें फाड़ देंगे? वो शादी के बाद भी आराम से पढ़ सकती है।"

रुद्र और रागिनी के पास अब शब्द नहीं थे... सुलोचना उनकी आंखों में इंकार साफ़ महसूस कर सकती थी, इसलिए उन्होंने कुलभूषण जी की तरफ़ देखते हुए कहा, "अब आप देख लीजिए मिस्टर जरीवाला, मैं तो सामने से दोस्ती का हाथ बढ़ा रही हूं, लेकिन शायद राजा साहब अभी भी मुझसे दोस्ती करना नहीं चाहते हैं, इसलिए तो रिश्ते की बात पर इतना सोच-विचार कर रहे हैं। वरना पूरे राजस्थान में कोई ऐसा नहीं है जो हमारे साथ रिश्ता ना जोड़ना चाहे... मैं तो चाहती थी ये जो सालों पुरानी चली आ रही दुश्मनी की आख़िरी कड़ी है, ये ख़त्म हो जाए, और शादी से अच्छी चीज़ और क्या हो सकती है?... वरना भूली मैं अभी भी नहीं हूं राजा साहब। आपकी वजह से मेरे पति की जान गई है, मेरे बेटे की जान गई है... पर फिर भी मैंने दिल बड़ा रखकर आपके सामने अपने पोते की शादी का प्रस्ताव रखा है। एक बार सोचिएगा ज़रूर..."

ये सुन रुद्र उन्हें देखकर कहता है, "इसमें सोचने वाली क्या बात है मैडम राठी? मैं मानता हूं कि आपका परिवार बहुत बड़ा है और कोई भी आपके साथ रिश्ता करने के लिए तैयार हो जाता है, लेकिन हम लोग अभी अपनी बेटी की शादी को लेकर इतना सीरियस नहीं हैं... और जहां तक बात रही दुश्मनी की, तो आप सच में दुश्मनी ख़त्म करना चाहती हैं, ये अच्छी बात है, पर हमारी तरफ़ से ये दुश्मनी कभी थी ही नहीं। वरना आप तो मेरे ही मारे थे... अगर मैं इस दुश्मनी को हमेशा से निभाना चाहता तो उसी दिन आपके बेटे की जान चली जाती, जिस दिन मैंने अपने पिता की आरती को कंधा दिया था। पर मैंने इस दुश्मनी को बहुत पहले ही भुला दिया है। लेकिन दुश्मनी भुलाने का मतलब ये नहीं है कि मैं अपनी बेटी की शादी आपके घर में करवा दूंगा..."

कुलभूषण जी रुद्र को समझाते हुए कहते हैं, "रुद्र, आराम से बात करो। वो बस एक बात कर रही है। अगर तुम्हें नहीं मंज़ूर है तो मना कर दो, पर इस तरीके से पुरानी चीज़ों को याद करके एक बार फिर से दुश्मनी की एक नई परिभाषा मत शुरू करो..."

उसके बाद उन्होंने सुलोचना जी की तरफ़ देखते हुए कहा, "मैडम राठी, अगर इन्हें आपकी तरफ़ से दिया हुआ रिश्ता मंज़ूर नहीं है तो आप भी इस बात को यहीं ख़त्म कर दीजिए... वैसे भी मेरी ही ज़बान से ये बात गलती से निकल गई थी। मैं अपनी गलती के लिए माफ़ी मांगता हूं। शायद आप दोनों के बच्चों का एक दूसरे के साथ कोई कनेक्शन ही नहीं है, तभी तो ये बात शुरू होने से पहले ही ख़त्म हो गई है। चलिए, कोई बात नहीं। मुझे पता चल गया है... मुझे राजा साहब की बेटी के लिए एक अच्छा और सही घर का लड़का तलाश करना है, और मैडम राठी के पोते के लिए एक अच्छे और सही घर की लड़की तलाश करनी है। ठीक है, आप दोनों के बच्चों की शादी कराने की ज़िम्मेदारी मेरी है।"

ये बात सुनकर सुलोचना राठी को गुस्सा तो बहुत आ रहा था, लेकिन वो इस हल्की सी दोस्ती की शुरुआत को हाथ से नहीं जाने देना चाहती थी क्योंकि उसके आगे उनका बहुत बड़ा मकसद शामिल था। उन्होंने ज़बरदस्ती हंसते हुए कहा, "अरे चलिए, अब सब कुछ सॉल्व हो ही गया है तो बात को यहीं ख़त्म करते हैं। कोई बात नहीं राजा साहब, आपको हमसे रिश्ता नहीं करना है ना सही, दोस्ती तो कायम रह सकती है ना..."

ऐसा कहते हुए उन्होंने अपना हाथ आगे बढ़ाया और रुद्र को देखने लगी। रुद्र की निगाहें सुलोचना देवी की आंखों में थीं जो कि बहुत सी राजनीति और साज़िशों से भरी हुई थीं। उसके बाद रुद्र ने धीरे से हाथ बढ़ाकर उनके साथ अपना हाथ मिलाते हुए हल्की सी मुस्कान के साथ सिर हिलाया और कहा, "जी बिल्कुल। दोस्त होने के नाते आपको कभी भी हमारी ज़रूरत पड़े तो बस हमें याद कर लीजिएगा..."

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