प्रतिज्ञा के पास और कोई ऑप्शन ही क्या था? उसने धीरे से अपना सर हाँ में हिलाया।
अक्षत ने एक नौकर को बुलाया। वह नौकर जल्दी से अक्षत के पास आया। अक्षत ने उस नौकर को देखकर कहा, "मैडम के लिए कुछ खाने के लिए ले आओ और घर में किसी को मत बताना कि मैडम अभी आउट हाउस में हैं।" नौकर ने हाँ में सर हिलाया और वहाँ से चला गया। अक्षत ने प्रतिज्ञा से कहा, "थोड़ी देर में खाना आ जाएगा, तुम तब तक आराम करो। रात काफी हो गई है, मैं सुबह बात करता हूँ।" प्रतिज्ञा ने भी धीरे से हाँ में सर हिलाया।
अक्षत जैसे ही आउट हाउस से निकलकर घर की तरफ गया, उसके कदम रुक गए। सामने दादी खड़ी थीं, और वह घूरते हुए अक्षत को देख रही थीं। अक्षत ने दादी को देखा और धीरे से अपना चेहरा नीचे कर लिया। पर दादी, अक्षत को देखते हुए, अपने रोबिली आवाज में बोलीं,
"मुझे तुमसे बात करनी है। मेरे कमरे में आओ।"
उसके बाद दादी अपनी छड़ी के सहारे अपने कमरे की तरफ बढ़ गईं। अक्षत ने एक गहरी साँस छोड़ी और दादी के पीछे-पीछे चल दिया।
अग्नि के कमरे में अग्नि अभी भी इंजेक्शन के असर से सोया हुआ था। तभी वह सपने में अपने और निशा के खूबसूरत पलों को देखने लगा।
निशा 15 साल की थी, और अग्नि 17 साल का था। अग्नि जल्दी से अपनी पीठ पर एक गिटार टाँगे हुए भागते हुए कहीं जा रहा था। वह एक पिज़्ज़ा हाउस पहुँचा जहाँ पर एक टेबल पर निशा गुस्से में बैठी उसे घूर रही थी। अग्नि जल्दी से उस टेबल पर गया और अपना गिटार साइड की चेयर पर रखते हुए, अपने दोनों कान पकड़ते हुए बोला, "सॉरी! सॉरी बेबी! सॉरी! मैं लेट हो गया।"
निशा गुस्से में अग्नि को घूरते हुए बोली, "अग्नि! यह तुम्हारा बचपना कब खत्म होगा? तुम्हें पता है, मैं कितनी देर से तुम्हारा इंतजार कर रही हूँ और तुम अब आ रहे हो?"
अग्नि ने पप्पी फेस बनाते हुए बहुत ही मासूमियत से कहा, "सॉरी यार! म्यूजिक क्लास बहुत देर से छूटी और उसके बाद देखो, मैं घर भी नहीं गया। मैंने कपड़े भी चेंज नहीं किये। मैं सीधा तुम्हारे पास चला आया क्योंकि मुझे पता था, मेरी छोटी सी फुलझड़ी इस समय बम बनी बैठी होगी।"
निशा ने अपना गुस्सा थोड़ा कम किया पर अग्नि को फिर भी टोहंट मारते हुए कहा, "यह सब ना तुम्हारे बहाने हैं अग्नि, मुझसे नहीं मिलने के। मुझे तो लग रहा है अब तुम्हारा मुझसे मन भर गया है और अब तो कभी-कभी मुझे ऐसा लगने लगा है कि मेरी जगह तुम्हारी जिंदगी में कोई और..."
निशा इससे पहले कुछ और कह पाती, अग्नि ने निशा को डाँटते हुए कहा, "निशा! क्या बकवास कर रही हो यार? माफ़ी मांग तो रहा हूँ तुमसे लेट आने के लिए। पर तुम तो अपना दिमाग कहीं और लगाकर बैठी हुई हो और खबरदार जो आज के बाद अपने मुँह से यह बात निकाली तो, मेरी जिंदगी में आज, कल और आने वाले कल में हमेशा तुम ही मेरे साथ रहोगी। मैं अपने साथ सिर्फ तुम्हें देखना चाहता हूँ, किसी और को तो मैं इमेजिन भी नहीं कर सकता और तुम इतनी बड़ी बात कैसे बोल सकती हो? तुम्हें यकीन नहीं है मेरे प्यार पर।"
निशा को एहसास हुआ कि उसने अग्नि को हर्ट कर दिया है। वह जल्दी से अग्नि के एक हाथ को अपने दोनों हाथों में थामते हुए बोली, "नहीं अग्नि, ऐसा नहीं है। मैं तो बस मजाक कर रही थी, मुझे क्या मालूम था कि तुम सीरियस हो जाओगे? मैं जानती हूँ, मेरा अग्नि पूरी दुनिया में सिर्फ मुझसे प्यार करता है। जब तुम बहुत बड़े स्टार बन जाओगे ना, तब भले ही लाखों लड़कियां मरेंगी तुम्हारे ऊपर, पर तुम्हारे दिल पर सिर्फ मैं राज करूँगी और तुम्हारी जिंदगी पर सिर्फ मेरा हक होगा।"
निशा की इतनी प्यारी बातें सुनकर अग्नि का गुस्सा एक पल में छू-मंतर हो गया और उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई। निशा साइड में रखा अपना बैग खोला और उसमें से कुछ निकालकर अग्नि को देते हुए बोली,
"यह मैं तुम्हारे लिए लाई हूँ। हमारे रिलेशनशिप को पूरे 4 साल हो गए हैं, तो उसके लिए एक छोटा सा गिफ्ट।"
अग्नि खुश होता हुआ वह पैकेट लिया और उसे ओपन किया। अग्नि ने देखा... एक छोटा सा लव कपल बना हुआ है पर वह दोनों एक-दूसरे से थोड़ी दूरी पर हैं और उनके बीच एक नदी जैसा कुछ बना हुआ है।
अग्नि उस शोपीस को देखकर बोला, "अरे निशा! यह कैसा गिफ्ट लाई हो तुम मेरे लिए। इसमें तो लव बर्ड्स एक-दूसरे के साथ ही नहीं हैं। यह देखो, इन दोनों के बीच यह नदी बह रही है।" निशा भी थोड़ी हैरानी से बोली, "हाँ, तो क्या हुआ नदी बह रही है? तू देख, कितना सुंदर लग रहा है ना देखने में।"
अग्नि ने कहा, "अरे पागल! ऐसा तोहफा नहीं देना चाहिए। इसका मतलब है कि यह दोनों प्यार करने वाले कभी एक नहीं हो सकते हैं। यह नदी इन दोनों को मिलने नहीं देगी और मैं नहीं चाहता, ऐसा कुछ हमारे रिश्ते में हो।" निशा ने वह गिफ्ट वापस लेते हुए कहा, "अच्छा सॉरी! मैं कुछ दूसरा गिफ्ट ले आऊंगी।" पर अग्नि ने अपने हाथ पीछे खींचते हुए कहा, "अरे! ऐसे कैसे। तुम इतने प्यार से मेरे लिए लाई हो, यह गिफ्ट मैं जरूर रखूँगा।"
निशा ने हैरानी से कहा, "पर तुमने तो अभी कहा कि ऐसा गिफ्ट नहीं देना चाहिए।" तो अग्नि ने हँसते हुए कहा, "हाँ! ऐसा कहते जरूर हैं, पर मैं इन सब बातों को नहीं मानता। और वैसे भी ऐसी कोई नदी हमारे बीच नहीं आ सकती जो हमें मिलने से रोक सके। और अगर मुझे तुमसे मिलने के लिए ऐसी नदियाँ छोड़ो, सात समंदर भी पार करने पड़ें ना तो मैं वह भी कर जाऊँगा। पर प्लीज निशा, हालात चाहे जैसे भी हों, तुम मेरे प्यार पर यकीन करना और मुझे कभी छोड़कर मत जाना।"
निशा ने भी अग्नि के दोनों हाथों को अपने हाथों में लिया और उसे मुस्कुराकर देखते हुए कहा, "मैं तुम्हें छोड़कर कभी नहीं जाऊँगी।"
और इसी के साथ अग्नि की आँखें झटके से खुल गईं और वह सपने से बाहर आ गया। अग्नि झटके से उठकर बैठ गया और घबराहट से इधर-उधर देखने लगा। वह इस वक्त अपने कमरे में था, पर निशा यहाँ नहीं थी। अग्नि को एक-एक करके सब याद आया कि कैसे उसकी शादी निशा से टूट गई, कैसे निशा उसकी ज़िन्दगी से चली गई। और यह सब याद आते ही अग्नि एक बार फिर से हताश हो गया। वह अपने घायल पैरों से बेड से उठा और चलते हुए एक ड्रॉअर के पास आया। उसने उस ड्रॉअर को ओपन किया और उसमें से एक छोटा-सा शोपीस निकाला। यह वही गिफ्ट था, जो निशा ने अग्नि को दिया था।
अग्नि उस गिफ्ट को लेता हुआ धीमे-धीमे कदमों से सोफे पर आया और उस गिफ्ट को लेकर सोफे पर बैठ गया। अग्नि की आँखों से आँसू बह रहे थे और वह लगातार उस गिफ्ट को देखे जा रहा था।
वहीं दूसरी तरफ, आउट हाउस में,
नौकर रात में खाना तो रखकर चले गए थे लेकिन प्रतिज्ञा का कुछ खाने का मन नहीं कर रहा था। वह खाना वैसा ही पड़ा हुआ था, प्रतिज्ञा ने उसकी तरफ देखा भी नहीं था। वह आज के हुए सारे हादसों के बारे में सोच रही थी। कैसे एक दिन में उसकी ज़िन्दगी बदल गई? कैसे एक दिन में उसकी किस्मत अग्नि से जुड़ गई? कैसे एक दिन ने उसकी पूरी दुनिया ही पलटकर रख दी? प्रतिज्ञा अपनी सोच में खिड़की के पास खड़ी थी। वह रात भर नहीं सोई थी। सोती भी कैसे? उसकी ज़िन्दगी में अब नींद और चैन आना कहाँ लाज़िमी था?
सुबह के करीब 6:00 बजे थे। प्रतिज्ञा पूरी रात खिड़की के पास ही खड़ी थी, उसे कोई खोज-खबर ही नहीं थी कि कब रात कट गई। तभी उसके कानों में कुछ आवाज आई। प्रतिज्ञा ने देखा कि दो मेड जो गार्डन की सफाई कर रही हैं, वह आपस में बात कर रही थीं।
एक मेड ने दूसरी से कहा, "अरे तुमने सुना क्या? अग्नि बाबा की तबीयत बहुत खराब हो गई थी, उन्होंने खुद को कमरे में बंद कर लिया था, कमरा तोड़कर अंदर जाना पड़ा और उनकी इतनी बुरी हालत हुई थी कि डॉक्टर बुलाने पड़े।" दूसरी मेड ने झाड़ू से पत्ते साफ़ करते हुए कहा, "तुमने तो सिर्फ़ सुना है, मैंने तो देखा है। कल मैं और एक दूसरी मेड, हम दोनों ही तो गए थे अग्नि बाबा के कमरे की सफाई करने के लिए। क्या बताऊँ? पूरा कमरा काँच तोड़कर तहस-नहस करके रखा हुआ था, सारे काँच तोड़ दिए। सारे शोपीस तोड़ दिए। कितने महँगे शोपीस रखे थे उनके कमरे में? उन्होंने एक-एक करके सारे शोपीस चकनाचूर कर दिए। यहाँ तक कि उनके कमरे में जो एलईडी टीवी था, वह तक तोड़ दिया।"
पहली मेड ने अपने मुँह पर हाथ रखते हुए कहा, "हाआआ! बेचारे अग्नि बाबा! निशा मैडम से कितना प्यार करते थे। मुझे तो वह दोनों एक-दूसरे के साथ बहुत अच्छे लगते थे, पर देखो किस्मत, दोनों एक नहीं हो सके।"
दूसरी मेड ने कहा, "अरे छोड़ो बहन! हम क्या ही बोल सकते हैं? यह बड़े लोगों की बात है। प्यार किसी और से किया, शादी किसी और से करने जा रहे थे, पर करके किसी और को ले आए। जल्दी चलो, बड़ी मैडम की पूजा का समय हो गया है। उससे पहले ही मुझे यह फूल मंदिर में रखने हैं वरना मुझे डाँटेंगी।"
दोनों को यह नहीं पता था कि खिड़की के उस पार प्रतिज्ञा उनकी बात सुन रही है। प्रतिज्ञा ने उन दोनों की सारी बातें सुन ली थीं, कैसे अग्नि ने खुद को नुकसान पहुँचाया? कैसे उसकी हालत इतनी खराब हो गई कि डॉक्टर को बुलाना पड़ा। प्रतिज्ञा को बहुत बुरा लग रहा था, अग्नि के लिए। प्रतिज्ञा को याद आया कि जब मोहल्ले वाले उसे परेशान कर रहे थे तो कैसे अग्नि ने उसका साथ दिया था। आज अग्नि की हालत खराब थी, पर प्रतिज्ञा उसके लिए कुछ नहीं कर पा रही थी।
प्रतिज्ञा को अग्नि के लिए बहुत बुरा लग रहा था, उसका मन बेचैन हो रहा था, भले ही हालात जैसे भी हों लेकिन अग्नि उसका पति है। वह ऐसे कैसे हाथ पर हाथ रखे बैठे रह सकती है? पर अगर वह मेंशन में गई और किसी ने उसे देख लिया तो कहीं कोई गलत न समझ ले।
प्रतिज्ञा ने देखा कि अभी सुबह के सिर्फ़ 6 ही बजे हैं और मेंशन की सारी खिड़कियाँ अभी तक बंद हैं। शायद बड़े लोग हैं, सुबह देर से उठते होंगे। यही सोचते हुए प्रतिज्ञा ने अपने चेहरे को अपने दुपट्टे से साफ़ किया और धीरे से आउट हाउस से निकलकर मेंशन की तरफ़ जाने लगी। उसने सोचा था कि बस एक नज़र अग्नि को देखकर वापस आ जाएगी। बस यह देख ले कि वह ठीक है, तो उसके मन को तसल्ली मिल जाएगी।
प्रतिज्ञा धीमे कदमों से मेंशन के दरवाजे पर पहुँची। आस-पास सिर्फ़ एक या दो ही सिक्योरिटी गार्ड थे और उनका भी ध्यान दरवाजे की तरफ़ नहीं था। प्रतिज्ञा दरवाजे के अंदर झाँककर देखती है तो घर के अंदर हाल में कोई नहीं था। प्रतिज्ञा को लगा कि शायद कोई उठा नहीं है इसीलिए वह जल्दी से अग्नि के कमरे में जाकर उसे देख लेगी। प्रतिज्ञा यह सोचते हुए मेंशन के अंदर आई। उसने पहला कदम मेंशन के अंदर रखा।
प्रतिज्ञा धीरे-धीरे से मेंशन के अंदर आई और आस-पास देखती रही। इतना बड़ा मेंशन! उसने आज तक सिर्फ़ इतने बड़े होटल ही देखे थे। लेकिन यह घर तो इतना बड़ा है कि यहाँ के लिविंग रूम में उसका पूरा मोहल्ला समा सकता है। इतने बड़े हॉल को देखकर प्रतिज्ञा एक पल के लिए शॉक हो गई। अब इतने बड़े घर में वह अग्नि का कमरा कहाँ ढूँढेगी? प्रतिज्ञा हाल के बीचो-बीच खड़ी होकर चारों तरफ अपनी नज़रें घुमाकर देख रही थी, और समझने की कोशिश कर रही थी कि अग्नि आखिर होगा कहाँ पर?
तभी उसके कानों में एक गुस्से वाली तीखी-सी और जोरदार आवाज आई, "तुम यहाँ क्या कर रही हो?"
प्रतिज्ञा ने आवाज़ की दिशा में देखा। उसकी साँस अटक गई। मंदिर से वाणी जी निकली थीं और गुस्से से प्रतिज्ञा को घूर रही थीं। वाणी जी को देखकर प्रतिज्ञा डर से काँपने लगी। उसे कल की वाणी जी की बात याद आई और अब उसकी हिम्मत नहीं थी कि वह वाणी जी को नज़र उठाकर देख सके। उसने अपना सिर झुका लिया।
वाणी जी जल्दी से प्रतिज्ञा के पास आईं और गुस्से से उस पर बरसते हुए बोलीं, "ऐ लड़की! तुझे कल मना किया था ना, इस घर में आने के लिए, तो गई क्यों नहीं यहाँ से?"
प्रतिज्ञा के सामने कुछ बोलने की हिम्मत नहीं हुई। वह धीरे-धीरे मिमियाने लगी।
"मैं...मैं...हूँ मैं.... मैं बस....में वह"
वाणी जी ने गुस्से में भड़कते हुए कहा, "यह बकरी की तरह मैं मैं क्या कर रही है? मुँह में ज़बान नहीं है क्या..? बोल क्या कर रही है इस घर में? इतनी सुबह जब घर के सारे लोग सो रहे हैं तो तू यहाँ पर क्या करने आई है, कुछ चुराने आई है क्या?"
प्रतिज्ञा ने हैरानी से वाणी जी की तरफ देखा और ना में सिर हिलाते हुए कहा, "नहीं, नहीं! आप गलत समझ रही हैं। मैं कुछ चुराने नहीं आई हूँ। मैं तो इन्हें देखने आई थी।"
बाहर इतना शोर सुनकर गुड्डी जी, जो इस समय मंदिर में बैठे रामायण का पाठ कर रही थीं, उनका ध्यान पूजा में नहीं लगा। उन्होंने हाथ जोड़े और रामायण बंद करके धीरे से अपनी छड़ी के सहारे बाहर आईं। उन्होंने देखा कि हाल में प्रतिज्ञा खड़ी है और वाणी प्रतिज्ञा को बुरी तरह से डाँट रही है। यह देखते ही दादी धीरे से वीणा के पास आईं और उससे कहा,
"वाणी! यह क्या कर रही हो तुम..?"
वाणी जी दादी को देखकर बोलीं, "माँ प्लीज! आप बीच में मत बोलिए। यह लड़की पहले मेरी बेटी की खुशियाँ खा गई और अब मेरे बेटे को खाने आई है।"
प्रतिज्ञा का पूरा चेहरा आँसुओं से लबालब भर गया था। उसकी तो वाणी जी के सामने कुछ कहने की हिम्मत ही नहीं हो रही थी।
वाणी जी प्रतिज्ञा को गुस्से से देखती हैं और कहती हैं, "क्या देखने आई थी? यही कि मेरा बेटा अब तक ज़िंदा भी है या मर गया।"
"वाणी! यह क्या बकवास कर रही हो..?" दादी गुस्से में बोलीं।
वाणी जी ने दादी को देख प्रतिज्ञा की तरफ गुस्से में उंगली करते हुए कहा, "इस लड़की की वजह से माँ, इस लड़की की वजह से मेरी बच्चे की खुशियाँ चली गईं। मेरा हँसता-खेलता मुस्कुराता बच्चा, आपने देखा नहीं, उसकी क्या हालत हो गई है?" ऐसा कहते हुए वाणी जी की आँखें भर आई थीं।
अक्षत जल्दी उठ गया था। उसे घर में सबसे पहले प्रतिज्ञा के लिए बात करनी थी। वह अपने बाथरूम से निकलकर अपने कपड़े ही पहन रहा था कि तभी उसे हाल से चिल्लाने की आवाज़ आई।
उसे क्या पता था कि रायता पहले ही फैल चुका है। रेखा जी भी मंदिर की तरफ़ आ ही रही थीं कि तभी उनकी नज़र हाल में चल रहे तमाशे पर गई। मोहन जी भी अब तक शोर सुनकर बाहर आ गए थे।
सब लोग हाल में आ गए। अक्षत जब प्रतिज्ञा को हाल में देखता है तो उसकी आँखें हैरानी से बड़ी हो जाती हैं। वह अपने मन में कहता है, "प्रतिज्ञा यहाँ क्या कर रही है?"
मोहन जी वाणी से कहते हैं, "वाणी, शांत हो जाओ। देखो, हम बैठकर बात करते हैं।"
वाणी जी अपने आँसू पोछती हैं और गुस्से में प्रतिज्ञा को देखकर कहती हैं, "बात क्या करनी है, बात तो हो चुकी है और मेरा फैसला अटल है। यह लड़की इस घर में नहीं रहेगी। इसके जैसी लड़की के लिए मेरे घर में कोई जगह नहीं है।"
अक्षत जल्दी से वहाँ आता है और कहता है, "छोटी माँ, शांत हो जाइए। देखिए, इन सब में प्रतिज्ञा की कोई गलती नहीं है। और कहीं क्यों जाएगी वह? वह बहू है इस घर की।"
वाणी जी ने अक्षत को घूरकर देखा और कहा, "कैसे हुई यह लड़की इस घर की बहू? जब मैं इसे अपनी बहू नहीं मानती तो यह घर की बहू कैसे हुई?"
अक्षत ने कहा, "क्योंकि यह अग्नि की पत्नी है। इस हक़ से यह इस घर की बहू है। आप कोई भी फैसला लेने से पहले एक बार अग्नि से बात कर लीजिए।"
तभी रेखा जी आती हैं और गुस्से से कहती हैं, "इसमें पूछने वाली क्या बात है? अग्नि तो बच्चा है। बच्चे तो गलती करते ही हैं। अब बच्चों की गलती बड़े ही तो सुधारते हैं। अग्नि ने भी नासमझी में गलती कर दी है। इसका मतलब यह तो नहीं है कि हम इस लड़की को अग्नि के सर पर बिठा देंगे।"
आगे कोई कुछ कहता, इससे पहले वाणी जी प्रतिज्ञा के बाजू को पकड़ती हैं और उसे खींचने लगती हैं। पर इससे पहले वाणी जी एक कदम और आगे बढ़ पातीं, जमीन पर बहुत तेज छड़ी के पटकने की आवाज़ आती है। सबका ध्यान दादी की तरफ़ था, क्योंकि उन्होंने जोर से जमीन पर छड़ी को पटका और वाणी की तरफ़ देखते हुए कहा,
"अगर सबको अपना फैसला खुद ही लेना है, तो इस घर में मेरी ज़रूरत ही क्या है? कहो तो मैं यह घर छोड़कर किसी वृद्ध आश्रम में चली जाती हूँ।"
"दादी ने ये कैसे कहा।" सब हैरान रह जाते हैं।
मोहन जी आगे आते हुए कहते हैं, "माँ! यह क्या कह रही हैं? आपसे किसने कहा कि आप की इस घर में कोई ज़रूरत नहीं है? आप इस घर की नींव हैं, माँ। अगर नींव ही हिल जाएगी तो यह घर कैसे सलामत रहेगा?"
दादी ने एक बार मोहन जी की तरफ़ देखा और हल्की सी मुस्कान के साथ कहा, "नहीं, सोचा एक बार पूछ लेती हूँ। क्या पता उम्र हो गई है, तो लोगों को ऐसा लगता होगा कि अब इस बुढ़िया की घर में क्या ही ज़रूरत, इसलिए मेरे फैसले मायने नहीं रखते होंगे।"
रेखा जी ने कहा, "माँ! ऐसा क्यों कह रही हैं? इस घर में आपकी बहुत अहमियत है और आपका फैसला हमारे लिए आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना पहले हुआ करता था।"



















Write a comment ...